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विलायत के माह–ए –मुबीं गौस ए आज़म | लों के तुम जां नशीं गौस ए आज़म

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विलायत के माह–ए –मुबीं गौस ए आज़म | लों के तुम जां नशीं गौस ए आज़म

 

विलायत के माह–ए –मुबीं गौस ए आज़म,

रसूलों के तुम जां नशीं गौस ए आज़म।

 

शबो रोज़ जलवें हो तेरे नज़र में,

कटे यूं ही उम्र ए हसीं गौस ए आज़म।

 

हो बग़दादो तैयबा का फैज़ान मुझ पर,

रहे दोनों मुझसे करीं गौस ए आज़म।

 

चलो फिर दयार ए हबीब ए खुदा को,

मिले सदका ए 11वी गौस ए आज़म।

 

बरसता रहे मुझपे बारान ए रहमत,

रहे मेरे दिल में मकीं गौस ए आज़म।

 

नबी  (ﷺ) के दुलारे हुसैनो हसन हैं,

हो तुम उनके नूर ए मुबीं गौस ए आज़म।

 

झुका है ये सर तेरी अज़मत के आगे,

है ज़ेर ए क़दम ये जबीं गौस ए आज़म।

 

मुज़य्यन है जलवों से अब तक तुम्हारे,

बहार ए गुलिस्तान ए दीं गौस ए आज़म।

 

न रूठू ज़माने के ज़ोरो सितम से,

मुझे दीजिए वो यकीं गौस ए आज़म।

 

बचा लो मुझे उनके शर्रो फितन से,

के है घाट में हासिदीं गौस ए आज़म।

 

है पेश ए नज़र आलाहज़रत का रौज़ा,

मिले हो हमे तुम यहीं गौस ए आज़म।

 

रज़ा साथ हो और शेर ए रज़ा भी,

हो जिस दम, दम ए वापसी गौस ए आज़म।

 

न डूबा न डूबे हमारा सफीना,

के है न–खुदा बिल–यकीं गौस ए आज़म।

 

छुपा लेंगे खुशतर को दामन में अपने,

तुफैल ए रज़ा है यकीं गौस ए आज़म।

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Mohammad Wasim

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