विलायत के माह–ए –मुबीं गौस ए आज़म,
रसूलों के तुम जां नशीं गौस ए आज़म।
शबो रोज़ जलवें हो तेरे नज़र में,
कटे यूं ही उम्र ए हसीं गौस ए आज़म।
हो बग़दादो तैयबा का फैज़ान मुझ पर,
रहे दोनों मुझसे करीं गौस ए आज़म।
चलो फिर दयार ए हबीब ए खुदा को,
मिले सदका ए 11वी गौस ए आज़म।
बरसता रहे मुझपे बारान ए रहमत,
रहे मेरे दिल में मकीं गौस ए आज़म।
नबी (ﷺ) के दुलारे हुसैनो हसन हैं,
हो तुम उनके नूर ए मुबीं गौस ए आज़म।
झुका है ये सर तेरी अज़मत के आगे,
है ज़ेर ए क़दम ये जबीं गौस ए आज़म।
मुज़य्यन है जलवों से अब तक तुम्हारे,
बहार ए गुलिस्तान ए दीं गौस ए आज़म।
न रूठू ज़माने के ज़ोरो सितम से,
मुझे दीजिए वो यकीं गौस ए आज़म।
बचा लो मुझे उनके शर्रो फितन से,
के है घाट में हासिदीं गौस ए आज़म।
है पेश ए नज़र आलाहज़रत का रौज़ा,
मिले हो हमे तुम यहीं गौस ए आज़म।
रज़ा साथ हो और शेर ए रज़ा भी,
हो जिस दम, दम ए वापसी गौस ए आज़म।
न डूबा न डूबे हमारा सफीना,
के है न–खुदा बिल–यकीं गौस ए आज़म।
छुपा लेंगे खुशतर को दामन में अपने,
तुफैल ए रज़ा है यकीं गौस ए आज़म।




