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वो है मेरा नबी, कमली वाला नबी

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वो है मेरा नबी, कमली वाला नबी

वो है मेरा नबी, कमली वाला नबी

ज़मीं तेरा दामन भी पढ़ जाएगा कम
वो सरवर की ताज़ीम लिख न सकेंगे
या सातों समुंदर भी बन कर सियाही
मुहम्मद की एक मीम लिख न सकेंगे

इश्क़ में ख़ुद ख़ुदा कह रहा है यही
है ख़ुदाई का मेरी उजाला नबी
वो है मेरा नबी, कमली वाला नबी

रहबर-ए-दीन है, जान-ए-ईमान है
जिसपे नाज़िल किया मैंने क़ुरआन है

सल्तनत में नबुव्वत की सुल्तान है
हश्र में आसियों का निगहबान है

उस अरब के सवारी का क्या शान है
जिसपे सारे पैग़ंबर भी क़ुर्बान है

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

जिसने फ़ाकों में रह के भी सज्दे किए
दुश्मनों से भी न जिसने शिकवे किए

दीन के नाम पे घर का घर दे दिया
कर्बला में नवासे का सर दे दिया

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

जिसने बातें सहीं, जिसने फाका सहा
शहर-ए-ताइफ़ में भी ख़ून जिसका बहा

हर सितम सह गया दीन-ओ-हक़ के लिए
नाम पर मेरे जिसने नवासे दिए

जिससे क़ायम हुई शान-ए-इंसान है
हाँ वही दोनों आलम का सुल्तान है

सबसे आख़िर में आया और अव्वल हुआ
मर्तबा जिसका काबे से अफ़ज़ल हुआ

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

लाख मेरी इबादत में मशगूल है
फिर भी बंदे तेरी ये बड़ी भूल है

शान-ए-महबूब से गर तू ग़ाफिल रहा
लाख आलिम है तू फिर भी जाहिल रहा

होंगे मक़बूल न तेरे सज्दे मुझे
मेरा फ़रमान है सुन ऐ बंदे मेरे

जिसके लब पे भी होगा मुहम्मद का नाम
ऐसे बंदे पे कर दूँगा दोज़ख़ हराम

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

जिससे प्यारे अली को शुजात मिली
अबू-बकर को भी जिससे सदाक़त मिली

प्यारे उस्मान को मेरी चाहत मिली
और उमर को भी ईमान की दौलत मिली

जिससे चारों खलीफ़ा महोब्बत करें
ख़ुल्द पे जिसकी बेटी हुकूमत करे

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

चाँद टुकड़े हुआ, डूबा सूरज उगा
संगरेज़ों ने भी जिसका कलमा पढ़ा

एक ही क्या सारे आलम को बख़्शूँगा मैं
जिसके सदक़े में आदम को बख़्शूँगा मैं

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

सर सितम का भी आख़िर झुका ही दिया
उसने कलमा उमर को पढ़ा ही दिया

बू-जहल घर का था दर-बदर हो गया
जिसने कलमा पढ़ा मुअतबर हो गया

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

हर गुनाह हर ख़ता बख़्शवाएगा जो
आसियों को भी जन्नत दिलाएगा जो

गर्मी-ए-हश्र से भी बचाएगा जो
अपनी उम्मत पे कमली उड़ाएगा जो

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

ज़िक्र से जिसके हर क़ल्ब म'मूर है
मेरा महबूब है वो मेरा नूर है

फ़िक्र-ए-उम्मत में रोता रहा उम्र भर
जो चटाई पे सोता रहा उम्र भर

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

फ़िक्र-ए-उम्मत में न सोया वो मेरा महबूब है
अश्कों से दामन जो धोया वो मेरा महबूब है

जो हर एक सज्दे में कहता, रब्बे हब्ली उम्मती
उठके जो रातों को रोया वो मेरा महबूब है

जिसके अपनों ने जिसको सताया बहुत
शहर-ए-मक्का में जो दुख उठाया बहुत

जिसके सदक़े में रहमत का ज़ीना बना
जिसके आने से यसरब मदीना बना

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

फ़लक के हसीं चाँद तारों से पूछो
ज़मीन के ये रंगीन नज़ारों से पूछो

ये कलियाँ, ये फूलों ये बहारों से पूछो
समंदर से पूछो, किनारों से पूछो

के जा-जा के दीन के इदारों से पूछो
ये कुरआन के तीसों पारों से पूछो

वो मक्का पे छाई घटाओं से पूछो
मदीने की दिलकश हवाओं से पूछो

जो क़ुर्बान हुई उन निगाहों से पूछो
वो दाई हलीमा की बाहों से पूछो

अली मुरतज़ा की शुजात से पूछो
अबू बकर की वो सदाक़त से पूछो

वो उस्मान गनी की मोहब्बत से पूछो
उमर की वो बे-लो चाहत से पूछो

गौस-उल-वरा की अदालत से पूछो
वो ख़्वाजा पिया की करामत से पूछो

हर एक औलिया की विलायत से पूछो
अरे बंदों ! ज़रा जाके जन्नत से पूछो

दुरूदों के नग़मे लुटाने लगेगी
हर एक श'अ से आवाज़ आने लगेगी

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

कहीं बातों में भी ये राज़ पोशीदा नहीं मिलता
कहीं दरिया मयस्सर है, कहीं क़तरा नहीं मिलता

करोड़ों मस्जिदें हैं और करोड़ों हैं नमाज़ी भी
हुसैन इब्ने 'अली से अब कहीं सज्दा नहीं मिलता

ख़ुदा की मार है उन पर या उनकी बदनसीबी है
वो अंधे हैं जिनको सरकार का जलवा नहीं मिलता

वो है मेरा नबी कमली वाला नबी

Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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