ये कहती थी घर घर में जा कर हलीमा
मेरे घर में ख़ैर-उल-वरा आ गए हैं
बड़े औज पर है मेरा अब मुक़द्दर
मेरे घर हबीब-ए-ख़ुदा आ गए हैं
उठी चार-सू रहमतों की घटाएँ
मु'अत्तर मु'अत्तर हैं सारी फ़ज़ाएँ
ख़ुशी में ये जिब्रील नग़्मे सुनाएँ
वो शाफ़े'-ए-रोज़-ए-जज़ा आ गए हैं
ये ज़ुल्मत से कह दो कि डेरे उठा ले
कि हैं हर तरफ़ अब उजाले उजाले
कहा जिन को हक़ ने सिराज-म्मुनीरा
मेरे घर वो नूर-ए-ख़ुदा आ गए हैं
मुक़र्रब हैं बेशक ख़लील-ओ-नजी भी
बड़ी शान वाले कलीम-ओ-मसीह भी
लिये 'अर्श ने जिन के क़दमों के बोसे
वो उम्मी लक़ब मुस्तफ़ा आ गए हैं
है सुन कर सख़ी आप का आस्ताना
है दामन पसारे हुए सब ज़माना
नवासों का सदक़ा, निगाह-ए-करम हो
तेरे दर पे तेरे गदा आ गए हैं
ख़ुदा के करम से नकीरैन आ कर
कहेंगे ज़ियारत का मुज़्दा सुना कर
उठो बहर-ए-ता'ज़ीम, नूर-उल-हसन ! अब
लहद में रसूल-ए-ख़ुदा आ गए हैं
शायर:
नूर-उल-हसन
ना'त-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी
अल्हाज सिद्दीक़ इस्माईल
एक टिप्पणी छोड़ें
आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा। आवश्यक फ़ील्ड * से चिह्नित हैं




