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अजमेर का जब ये मंज़र है, बग़दाद का मंज़र क्या होगा

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अजमेर का जब ये मंज़र है, बग़दाद का मंज़र क्या होगा
 
अजमेर का जब ये मंज़र है, बग़दाद का मंज़र क्या होगा
रहते हैं जहां नबियों के नबी, वो शहर-ए-मुनव्वर क्या होगा
 
वो कलमा पढ़ाएं चोरों को , मुर्दों को उठा दें ठोकर से
जब ग़ौस में इतना पावर है, तो सरकार का पावर क्या होगा
 
हैं आज भी अपने उल्जन में , उठते हैं सवाल अक्सर मन में
जो अपना जनाज़ा खुद ही पढ़े, वो साबिर-ए-कलियर क्या होगा
 
जब हुस्न था उनका जलवा-नुमा , अनवार का 'आलम क्या होगा
हर कोई फ़िदा है बिन देखे, दीदार का 'आलम क्या होगा
 
एक सिम्त 'अली , एक सिम्त 'उमर, सिद्दीक़ इधर , उस्मान उधर
इन जगमग-जगमग तारों में, महताब का 'आलम क्या होगा
 
चाहे तो इशारे से अपने, काया ही पलट दे दुनिया की
ये शान है उनके ग़ुलामों की , सरदार का 'आलम क्या होगा
 
दुल्हन जो लगाले तो उसकी, नस्लें भी मु'अत्तर हो जाएं
आक़ा का पसीना ऐसा है, तो जिस्म-ए-मु'अत्तर क्या होगा
 
वो सजदा करें तो सजदे में , यूँ रात मुकम्मल हो जाए
बेटी है नबी की जब ऐसी, तो नबियों का वो सरवर क्या होगा 
Mohammad Wasim

Mohammad Wasim

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