Hazrat Sheikh Khwaja Syed Moinuddin Hasan Chisti Order: Chisti Born: 530 AH/1136 AD Isfahan or Sistan (Modern-day Iran) Passed away: 627 AH/1230 AD Ajmer, India Resting place: Ajmer, India, Map of Burial Place Title(s):Gharib Nawaz, Sultan-ul-Hind
ख्वाजा गरीब नवाज 14 रजब 536 हिजरी (1142 ईस्वी) को पीर (सोमवार) के दिन सिस्तान (ईरान देश का एक गांव) में पैदा हुए। कुछ विद्वान इनकी पैदाइश की तारीख और जन्म की जगह को अलग अलग बताते हैं। बहरहाल 9 साल की उम्र में आप हाफिज ए कुरान हो गए। ख्वाजा साहब की तालीम उनके घर पर ही हुई थी। विरासत में आपको एक छोटा सा बाग़ और एक पनचक्की मिली थी। हज़रत इब्राहिम कंदोजी से मुलाकात होने के बाद जब दिल की दुनिया बदली तो उसे बेच कर पैसा गरीबों में बांट दिया और खुद हक़ की तलाश में निकल पड़े।
आपने -अपने पीर हज़रत ख्वाजा उस्मान हारुनी रहमतुल्लाह अलैह कि 20 साल तक खिदमत की, इस दौरान आप हज़रत का बिस्तर, खाने के बर्तन, पानी की मशक और अपना सामान कंधे पर लाद कर घूमते फिरे।आपने 51 बार पैदल हज पर फ़रमाया और 52 साल की उम्र में 587 हिजरी (1192 ई.) में हिंदुस्तान तशरीफ़ लाएं।
अजमेर पहुंचकर आपको इस्लाम की तब्लीग़ शुरू करने से पहले किन किन हालात से दो-चार होना पड़ा उसे दोहराने की जरूरत नहीं। बहरहाल आपने अपनी रूहानी ताकत से शाही और शैतानी ताकतों का मुकाबला फरमा कर उन्हें ज़ेर फरमाया। आप हमेशा लोगो के लिए काफी फिकरमंद रहते थे।
आप गरीबों, दुखी लोगों के मसीहा बने, इंसानियत की खिदमत को अपना मिशन बनाकर इस्लाम की तब्लीग़ शुरू फ़रमाई।आपने अजमेर और आसपास के इलाको में इस्लाम,अमन और शांति का पैगाम घर घर पहुंचाया।
आपने एक ही कपड़े में जिंदगी बिताई। कपड़े फटने पर पैवन्द लगा लिया करते थे। पैवन्द लगाते लगाते उसका वजन साढ़े छह किलो हो गया था।
6 रजब 633 हिजरी में आप अजमेर में पर्दा फरमा गए। इंतकाल के बाद आपकी पेेशानी पर नूरानी हरफों में लिखा हुआ था "हाजा हबीबुल्लाह माता फी कुतुबुल्लाह" मतलब की यह अल्लाह का दोस्त है जिसने अल्लाह की मोहब्बत में वफ़ात पायी। हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की बरकत से हिंदुस्तान में इस्लाम का नूर फैला।
आपने कभी पेट भर खाना नहीं खाया कई कई दिनों तक भूखे रहने के बाद सूखी रोटी के टुकड़े पानी में भिगोकर खा लिया करते। आप 24 घंटे के अंदर पुरे कुरान शरीफ की तिलावत कर लिया करते थे। आपने तकरीबन 70 साल तक लगातार पूरी रात आराम नहीं फरमाया।
आप 70 साल तक दिन रात के अक्सर औक़ात बावज़ू रहे, आप तो वली थे ही लेकिन आप जिस पर एक नजर डाल देते वह भी वली हो जाता। काफी दिनों तक आप इस्तिगराक(किसी चीज़ में डूब जाना) के आलम में रहे आंखें बंद किए ज़िक्रे इलाही में गुम रहते। नमाज के वक्त हुजरे से बाहर तशरीफ ला कर जमाअत से नमाज अदा फरमाया करते।
आज भी आपका आस्ताना दीन दुखियों और हक़परस्तो के लिए मर्कज़े अकीदत बना हुआ है, जहां रोजाना हजारों आते हैं और फ़ैज़ पाते हैं।आज भी अजमेर को आप के नाम से दुनिया में जाना जाता हैं। सालाना उर्स के दौरान दुनिया भर के लाखो लोग आपके दरबार में दुआएं/मुरादे मांगने आते हैं।
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